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इमरान खान को बड़ा झटका, पार्टी संविधान के उल्लंघन का आरोप अदालत में हुआ साबित

इमरान खान की पार्टी ‘पीटीआई’ के अध्यक्ष के चुनाव के दौरान पार्टी संविधान के उल्लंघन का आरोप पाकिस्तान हाईकोर्ट में साबित हुआ है।

Edited By: Niraj Kumar @nirajkavikumar1
Published : Jan 13, 2024 10:23 pm IST, Updated : Jan 13, 2024 10:26 pm IST
Imran khan, Pakistan- India TV Hindi
Image Source : FILE इमरान खान, पूर्व प्रधानमंत्री, पाकिस्तान

इस्लामाबाद: पाकिस्तान के हाईकोर्ट ने शनिवार को कहा कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी ‘पीटीआई’ के अध्यक्ष के चुनाव के दौरान पार्टी संविधान के उल्लंघन की बात "साबित" हुई है। चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा ने कहा, ‘‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का संविधान कहता है कि अध्यक्ष हर दो साल के अंतराल पर चुना जाएगा, जबकि अन्य (सदस्य) हर तीन साल पर चुने जाएंगे। पार्टी संविधान का उल्लंघन इस हद तक साबित होता है।’’ डॉन डॉट कॉम की रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘तीन-सदस्यीय पीठ का नेतृत्व कर रहे जट्सिट ईसा, निर्वाचन आयोग की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पीटीआई के चुनाव चिह्न ‘बल्ले’ को बहाल करने के पेशावर हाईकोर्ट (पीएचसी) के फैसले को चुनौती दी गई थी।’’ 

डॉन की रिपोर्ट में कहा गया है कि आठ फरवरी के आम चुनावों से पहले निर्वाचन आयोग शनिवार को राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न आवंटित करेगी। इससे पहले शुक्रवार को पीटीआई को झटका देते हुए चीफ जस्टिस ने फैसला सुनाया कि चुनाव चिह्न 'बल्ले' को बहाल करने का हाईकोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण था। आयोग ने बृहस्पतिवार को पेशावर हाईकोर्ट (पीएचसी) के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिसने खान की पार्टी में संगठनात्मक चुनावों को "असंवैधानिक" घोषित करने के अपने फैसले को रद्द कर दिया और क्रिकेट का 'बल्ला' चुनाव चिह्न रद्द कर दिया था। 

चुनाव आयोग ने 22 दिसंबर को पीटीआई को अपने आंतरिक चुनावों में अनियमितताओं का हवाला देते हुए आगामी आठ फरवरी के चुनाव के लिए अपना चुनाव चिह्न 'बल्ला' रखने से रोक दिया था। उनके चुनाव चिह्न रद्द करने के आयोग के फैसले के बाद, पीटीआई ने इसे पीएचसी में चुनौती दी, जहां एक-सदस्यीय पीठ ने अस्थायी राहत देते हुए चुनाव चिह्न बहाल कर दिया और मामले को नौ जनवरी को सुनवाई के लिए एक बड़ी पीठ को भेज दिया। एक नाटकीय घटनाक्रम में पीएचसी ने अपने पहले के फैसले को पलट दिया और ईसीपी के आदेश को बरकरार रखा था।

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