Sunday, January 11, 2026
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मैं इस्लाम नहीं मानती लेकिन... मुस्लिम महिला की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट भी कंफ्यूज, केंद्र से मांगा जवाब

याचिका दाखिल करने वाली साफिया और उसके पिता नास्तिक हैं, लेकिन जन्म से मुस्लिम होने के चलते उन पर शरीयत कानून लागू होता है। याचिकाकर्ता का भाई डाउन सिंड्रोम नाम की बीमारी के चलते असहाय है। वह उसकी देखभाल करती है। शरीयत कानून में बेटी को बेटे से आधी संपत्ति मिलती है।

Edited By: Khushbu Rawal @khushburawal2
Published : Jan 28, 2025 04:01 pm IST, Updated : Jan 28, 2025 04:10 pm IST
supreme court- India TV Hindi
Image Source : FILE PHOTO सुप्रीम कोर्ट पहुंची इस्लाम न मानने वाली मुस्लिम महिला (प्रतीकात्मक तस्वीर)

देशभर में समान नागरिक संहिता (UCC) पर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि क्या मुस्लिम परिवार में जन्मा व्यक्ति संपत्ति के मामले में धर्मनिरपेक्ष कानूनों का पालन कर सकता है या मुस्लिम पर्सनल लॉ शरिया का पालन करने के लिए बाध्य है। इसका जवाब देश की शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। मई के दूसरे सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट मामले को सुनेगा।

जानें क्या है पूरा मामला

मामले में याचिकाकर्ता केरल के अलप्पुझा की साफिया पी.एम. नाम की महिला है। उसका कहना है कि उसका परिवार नास्तिक है, लेकिन शरीयत के प्रावधान के चलते एक पिता चाह कर भी अपनी बेटी को 1 तिहाई से अधिक संपत्ति नहीं दे सकते हैं। बाकी संपत्ति पर भविष्य में पति के भाइयों के परिवार का कब्जा हो जाने की आशंका है। याचिका दाखिल करने वाली साफिया और उसके पति नास्तिक हैं, लेकिन जन्म से मुस्लिम होने के चलते उन पर शरीयत कानून लागू होता है। याचिकाकर्ता का बेटा डाउन सिंड्रोम नाम की बीमारी के चलते असहाय है। बेटी उसकी देखभाल करती है। शरीयत कानून में बेटी को बेटे से आधी संपत्ति मिलती है। ऐसे में पिता बेटी को 1 तिहाई संपत्ति दे सकते हैं, बाकी 2 तिहाई उन्हें बेटे को देनी होगी। अगर भविष्य में पिता और भाई की मृत्यु हो जाएगी तो भाई के हिस्से वाली संपत्ति पर पिता के भाइयों के परिवार का दावा बन जाएगा।

सफिया ने अपनी याचिका में कहा है कि वह और उसके पति मुस्लिम नहीं हैं, इसलिए उन्हें भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के दिशा-निर्देशों के अनुसार संपत्ति का बंटवारा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। वर्तमान में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम मुसलमानों पर लागू नहीं होता। साफिया की याचिका में इसे चुनौती दी गई है।

मामले में याचिकाकर्ता की दलील है कि संविधान का अनुच्छेद 25 लोगों को अपने धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार देता है। यही अनुच्छेद इस बात का भी अधिकार देता है कि कोई चाहे तो नास्तिक हो सकता है इसके बावजूद सिर्फ किसी विशेष मजहब को मानने वाले परिवार में जन्म लेने के चलते उसे उस मजहब का पर्सनल लॉ मानने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। वकील ने यह भी कहा था कि अगर याचिकाकर्ता और उसके पिता लिखित में यह कह देंगे कि वह मुस्लिम नहीं है, तब भी शरीयत के मुताबिक उनकी संपत्ति पर उनके रिश्तेदारों का दावा बन जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सीजेआई संजीव खन्ना की अध्यक्षा वाली बेंच के समक्ष एसजी तुषार मेहता ने कहा कि एक महिला, जो शरिया नहीं मानती, मसला उसका है। सीजेआई ने कहा कि यह सभी धर्मों पर लागू होगा। आपको एक जवाब दाखिल करना होगा, अगर हम कोई आदेश पारित करते हैं तो आपको अनुमति देने के लिए कई फॉर्म आदि होने चाहिए। एसजी ने कहा कि सही है, मैं अपने धर्म का उल्लेख नहीं करूंगा। एसजी ने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि उनकी केवल एक बेटी है और वह पूरी संपत्ति बेटी को देना चाहती हैं, लेकिन शरीयत कानून केवल 50% की अनुमति देता है।

शरीयत एक्ट की धारा 3 में क्या प्रावधान है?

दरअसल, शरीयत एक्ट की धारा 3 में प्रावधान है कि मुस्लिम व्यक्ति को यह घोषणा करता है कि वह शरीयत के मुताबिक उत्तराधिकार के नियमों का पालन करेगा, लेकिन जो ऐसा नहीं करता, उसे 'भारतीय उत्तराधिकार कानून' का लाभ नहीं मिल पाता, क्योंकि उत्तराधिकार कानून की धारा 58 में यह प्रावधान है कि यह मुसलमानों पर लागू नहीं हो सकता।

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