मुंबई. दुनिया में एक न्यायोचित, सक्षम और सतत् खाद्य उतपादन, वितरण और खपत के तौर तरीके से कुपोषण की समस्या से निपटा जा सकता है।एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण से विश्व अर्थव्यवस्था को हर साल 13,600 अरब डालर का नुकसान होता है। क्रेडिट सूईस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने मंगलवार को जारी रपट में कहा है कि कुपोषण और बढ़ती जनसांख्यिकी के दोहरे बोझ से इस चुनौती और पर्यावरण पर दबाव बढ़ता है। खाद्य उत्पादन और खपत में एक अधिक टिकाऊ प्रणाली की तरफ बदलाव कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
संयुक्तराष्ट्र का अनुमान बताता है कि दुनिया की आबादी 2050 तक मौजूदा 7.8 अरब से बढ़कर करीब दस अरब पर पहुंच जायेगी और 2100 तक यह 11 अरब पर पहुंच जायेगी। लेकिन जनसंख्या में होने वाली यह वृद्धि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अलग अलग तरह से होगी। इसमें से 93 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि अगले तीन दशक के दौरान कम विकसित माने जाने वाले अफ्रीका (59 प्रतिशत) और एशिया (34 प्रतिशत) में होने का अनुमान है।
इस आबादी को खाने के लिये वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के अनुमान के मुताबिक कैलोरीज में खाद्य उत्पादन 2010 से लेकर 2050 के बीच 56 प्रतिशत बढ़ना चाहिये। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक टिकाऊ वैश्विक खाद्य प्रणाली से मानव स्वास्थ्य और वैश्विक पारिस्थिकी को लाभ होता है। लेकिन यह वास्तविकता से काफी दूर है। करीब 70 करोड लोग अल्पपोषण का शिकार है। 1.8 अरब लोग मोटापे के शिकार है और दुनिया में कुल मौतों का 20 प्रतिशत मौतें खानपान में गड़बड़ी की वजह से होती हैं। इस प्रकार कुपोषण से ही वैश्विक अर्थव्यवसथा को 13,600 अरब डालर का सालाना नुकसान पहुंचता है।
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