नई दिल्ली: हिंदुस्तान के किसान आंदोलन के लिए आज सबसे बड़ा दिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार तीनों कृषि कानून किसानों के भले के लिए लेकर आई थी लेकिन वो कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए और अब सरकार कृषि कानूनों को वापस ले रही है। संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार तीनों कानून वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करेगी। पीएम मोदी ने खुले मन से कहा कि ये समय किसी को भी दोष देने का नहीं है। सरकार ने 3 कृषि कानून वापस ले लिए हैं और अब किसान साथी अपने-अपने घर लौटें।
जानें, क्या थे तीनों कृषि कानून
1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020- इस कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान किया गया था। ऐसा माना जा रहा था कि इस कानून के प्रावधानों से किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा, क्योंकि बाजार में स्पर्धा बढ़ेगी। बता दें कि साल 1955 के इस कानून में संशोधन किया गया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए उनके उत्पादन, सप्लाई और कीमतों को नियंत्रित रखना था।
2. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020- इस कानून के तहत किसान एपीएमसी यानी कृषि उत्पाद विपणन समिति के बाहर भी अपने उत्पाद बेच सकते थे। इस कानून के तहत बताया गया था कि देश में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जाएगा, जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी के बाहर फसल बेचने का आजादी होगी। प्रावधान के तहत राज्य के अंदर और दो राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। साथ ही, मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन पर खर्च कम करने का भी जिक्र था। नए कानून के मुताबिक, किसानों या उनके खरीदारों को मंडियों को कोई फीस भी नहीं देना होती।
3. कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020- इस कानून का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी फसल की एक निश्चित कीमत दिलवाना था। इसके तहत कोई किसान फसल उगाने से पहले ही किसी व्यापारी से समझौता कर सकता था। इस समझौते में फसल की कीमत, फसल की गुणवत्ता, मात्रा और खाद आदि का इस्तेमाल आदि बातें शामिल होनी थीं। कानून के मुताबिक, किसान को फसल की डिलिवरी के समय ही दो तिहाई राशि का भुगतान किया जाता और बाकी पैसा 30 दिन में देना होता। इसमें यह प्रावधान भी किया गया था कि खेत से फसल उठाने की जिम्मेदारी व्यापारी की होती। अगर एक पक्ष समझौते को तोड़ता तो उस पर जुर्माना लगाया जाता।
किसान क्यो कर रहे थे कृषि कानूनों का विरोध?
किसान काफी समय से इन तीनों कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे। किसान संगठनों का आरोप था कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा, जिससे किसानों को नुकसान होगा। इस नए बिल के मुताबिक, सरकार आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई पर अति-असाधारण परिस्थिति में ही नियंत्रण करती। नए कानून में उल्लेख था कि इन चीजों और कृषि उत्पाद की जमाखोरी पर कीमतों के आधार पर एक्शन लिया जाएगा। सरकार इसके लिए तब आदेश जारी करेगी, जब सब्जियों और फलों की कीमतें 100 फीसदी से ज्यादा हो जातीं। या फिर खराब न होने वाले खाद्यान्नों की कीमत में 50 फीसदी तक इजाफा होता। किसानों का कहना था कि इस कानून में यह साफ नहीं किया गया था कि मंडी के बाहर किसानों को न्यूनतम मूल्य मिलेगा या नहीं। ऐसे में हो सकता था कि किसी फसल का ज्यादा उत्पादन होने पर व्यापारी किसानों को कम कीमत पर फसल बेचने पर मजबूर करें। तीसरा कारण यह था कि सरकार फसल के भंडारण का अनुमति दे रही है, लेकिन किसानों के पास इतने संसाधन नहीं होते हैं कि वे सब्जियों या फलों का भंडारण कर सकें।
जानिए कृषि कानूनों पर कब क्या हुआ?
- 14 सितंबर 2020- संसद में पेश
- 17 सितंबर 2020- संसद से पारित
- 14 अक्टूबर 2020- किसान संगठनों-केंद्र के बीच बातचीत
- 3 नवंबर 2020- देश भर में किसानों की नाकेबंदी
- 13 नवंबर 2020- किसान संगठनों-केंद्र के बीच बातचीत
- 25 नवंबर 2020- किसानों का दिल्ली कूच का ऐलान
- 3 दिसंबर 2020- केंद्र का फिर बातचीत का प्रस्ताव
- 8 दिसंबर 2020- किसानों का भारत बंद
- 7 जनवरी 2021- सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
- जनवरी 2021- SC ने एक्सपर्ट कमेटी बनाई
- 26 जनवरी 2021- किसानों का लाल किला मार्च
- 6 फरवरी 2021- किसानों का चक्का जाम
- 20 मार्च 2021- एक्सपर्ट कमेटी ने SC में रिपोर्ट सौंपी
- जुलाई 2021- किसान संसद की शुरुआत
- 19 नवंबर 2021- तीनों कृषि कानून रद्द
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